Saturday, May 16, 2020

"पाताल लोक" यह गंदगी अनुष्का शर्मा द्वारा निर्मित है

 इससे पहले में चालू करू, मैं आपको एक तस्वीर दिखाना चाहता हूँ जो की इस सीरीज की एक हल्की सी  झलक आपके सामने रखेगी। इस तस्वीर में एक हिन्दू महाराज जो की मांस पका कर एक हिन्दू नेता को दे रहा है जो वही मांस एक देवी की तस्वीर जो की गाय पर सवार है के सामने बैठ कर खा रहा है।

Image from Paatal Lok Web Series by Anushka Sharma
अनुष्का शर्मा द्वारा निर्मित वेब सीरीज "पाताल लोक" का एक दृश्य 
तो मैंने यह सीरीज देखा, जिसका नाम "पाताल लोक" हैं, मुझे इसके बारे में कुछ नहीं मालूम था, पर इतना पता था की यह भी दूसरे भारतीय वेब सीरीज की तरह औसत दर्जे का और हिन्दू विरुद्ध प्रचार प्रसार होगा , और क्या था मैं पूरी तरह सही था।

जो इस सीरीज को देखना चाहता है, तो इसके आगे न पढ़े क्यों की इसके आगे हम प्रमुख कथानक बिंदुओं और पात्रों के बारे में बात करेगा।
पाताल  लोक के कुछ दृश्य - नीरज कबी 
यहाँ पर कहानी एक पत्रकार की हत्या के प्रयास के इर्द-गिर्द घूमती है। (नीरज कबी जो की रविश कुमार के जैसे दिखते है ऐसा मुझे लगता है) नीरज कबी जो की एक उदारवादी पत्रकार माना जाता है, उसका  संबंध है सारा से, जो जाहिर तौर पर उससे कहीं अधिक उदार है।

यहाँ पर सभी पृष्ठभूमि के लोग पकडे जाते है,(विविधता भी तो महत्वपूर्ण है), पकड़े जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपराधी  ठहराने के लिए एक बैकस्टोरी दी जाती है, जिससे आप उससे घृणा करने लगे। ये बैकस्टोरी वामपंथियों द्वारा  फैलाये जा रहे बकवास से भरी हैं, जैसे की उच्च जातियों के लोग निचली जाति के लोगो को परेशान करते हैं,  इससे निचली जाति के लोग हथियार उठाते हैं और हत्यारे बन जाते हैं,  और जाहिर है कि इसमें उनकी गलती नहीं है।

एक मुस्लिम चोर बन जाता है और यह सब इसलिए क्योंकि बचपन से ही हिंदुओं ने हर मुस्लिम को मार डाला है। उसके भाई की तरह। पृष्ठभूमि बाबरी मस्जिद और राम मंदिर मामले की है। तब उसका पिता यह कहने पर मजबूर हो जाता है "मैंने उसे मुसलमान भी नहीं बनने दिया, आप तो आतंकी बन रहे है"। हिंदुओं द्वारा राम का जाप करने के कारण मुस्लमान अपने धर्म का पालन नहीं कर पा रहे।

मुख्य खलनायक का नाम "बाजपेयी" है, जो एक ब्राह्मण है, जो गंगाजल साथ ले कर चलाता है और हर बार वह उसका इस्तेमाल करता है जब वह दूसरी जाति के व्यक्ति के घर में प्रवेश करता है। सभी खलनायको को या तो किसी हिंदू भगवान के भक्त के रूप में दिखाया गया है, या वे बुरे काम करने से पहले भजन सुनते हैं।

प्रमुख नकारात्मक चरित्र में उस व्यक्ति का रूप दिखाया गया है जो मंदिर को दान देता है। इसलिए शिव मंदिर ने उसका नाम उन लोगों के बीच रखा है जिन्होंने मंदिर को दान किया है। यहाँ यह दावा किया गया है की मंदिर समाज विरोधी ताकतों को संरक्षण देता हैं।

हिंदुओं के संबंध में यहाँ सिर्फ नकारात्मक ही दिखाई गयी है। इसके विपरीत एक बहुत ही ईमानदार पुलिस अधिकारी, जो आईएएस बनने का ख्वाहिशमंद है और वह मुस्लमान है। वह सदाचार की परिभाषा है। नायक से भी बेहतर है जिसके पास अभी भी कुछ मुद्दे हैं। उसपर धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील दिखने का दबाव दिखाया गया है जबकि उनके हिंदू सहकर्मी  लोग उनका मज़ाक उड़ाते हैं या उनके धर्म के बारे में बात करते हैं। वह अपनी धार्मिक पुस्तकों हर समय साथ लेकर चलता है लेकिन बहुत ही नरम दिल है।

अब साजिश पर आते है। 4 लोग पत्रकार की हत्या करने जा रहे हैं। लेकिन इससे पहले की वो कुछ करते चारो पकड़े जाते हैं। और पूछताछ की जाती है। नायक मामला की जाँच करता है और इसके पीछे कोई यूपी का "बाजपेयी" और "गुर्जर" की प्रतिद्वंद्विता को पाता है, और उससे पता चलता है कि पत्रकार तो बिल्कुल भी लक्ष्य नहीं थी। लक्ष्य तो  खुद खलनायको में से एक था। पत्रकार को  सिर्फ इसलिए लक्ष्य बनाया गया था ताकि त्यागी नाम के 4 हत्यारों में से एक को रस्ते से हटाया जा सके।

इसकी जांच के दौरान कुछ कारणों से, यह मामला सीबीआई को सौंप दिया जाता है, जिन्होंने एक पूरी तरह से अलग कहानी पेश करते हुए कहा कि वे लोग आईएसआई द्वारा प्रायोजित हैं और कुछ दिनों के लिए बटला हाउस में भी ठहरे थे।

पत्रकार का  बॉस बहुत ही भ्रष्ट है और "लेफ्ट-लिबरल्स" से नफरत करता है। पत्रकार निरंतर यही कहता रहता है कि "आपकी किसी से दुश्मनी है ? जैसे एक साधारण से सवाल पर "लोग ट्विटर पर जान से मरने की दमकी दे रहे है, या पाकिस्तान भेजने की बात कर रहे है। (रविश याद आ रहा था तब)

अब मैंने इतनी लंबी पोस्ट क्यों लिखी? क्योंकि मेरी तरह कई लोग जिज्ञासा से पहली बार इसे देख सकते हैं, कृपया न देखे ,  नहीं देखेंगे तो आप अपना दिमाग पर , कुछ उपकार करेंगे। इसके अलावा, बहुत सारे गैर राजनीतिक लोग हैं जो इस तरह के विष्टा को देखते हैं, और वे इसको सच मानेगे क्योंकि यह एक वेब सीरीज में प्रस्तुत किया गया है।

मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि राइट विंग, मीडिया और फिल्मों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहा है। और यह हमें बहुत महंगा पड़ने वाला है। ऐसी सीरीज के खिलाफ विरोध करने का वास्तव में कोई मतलब नहीं है अगर हम ऐसे फिल्मों और सीरीज के माध्यम से अपना पक्ष बनाकर न रख सके। मैं इसे नहीं देखना चाहता था, लेकिन मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मैं यह देखना चाहता था कि वे फिल्मों और वेब सीरीज के द्वारा प्रचार कैसे करते हैं। और  हमे उस स्तर पर हमारे पक्ष को रखने के लिए किन प्रयासों की आवश्यकता होगी।

मुझे नहीं पता कि आज कल फिल्मो का लोगों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए यह कहना ठीक होगा की "फिल्मों से दूर रहना" यही एक विकल्प है। 

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